जैविभा विश्वविद्यालय के 35 वर्षों के इतिहास-वृतांत की पुस्तक ‘उत्कर्ष’ का लोकार्पण
लाडनूँ, 30 अक्टूबर 2026। जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के इतिहास-वृतांत को समेटे हुए विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘उत्कर्ष’ का लोकार्पण यहां सुधर्मा सभा में अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में किया गया। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं केन्द्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल एवं कुुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने आचार्यश्री महाश्रमण को इस इतिहास पुस्तक की प्रतियां भेंट की। इस अवसर पर कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने बताया कि आचार्यश्री तुलसी के स्वप्न के अनुकूल इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी और यह विश्वविद्यालय अपने अनुशास्ताओं के आशीर्वाद एवं दिग्दर्शन में तुलसी के स्वप्नों को आज पूरी तरह से साकार करने में जुटा हुआ है। विश्वविद्यालय की सोच और स्थापना से लेकर वर्तमान स्थिति तक की समस्त प्रगति का लेखाजोखा इस इतिहास पुस्तक में आ गया है। स्थापना के 35 वर्षों के काल में जितने भी कुुलाधिपति और कुलपति रहे उन सबके कार्यकाल का विवरण समाहित करते हुए यह पुस्तक विश्वविद्यालय की मूल अवधारणा और उसके अनुरूप उन्नति के शिखर की यात्रा को रेखांकित करती है।
इस अवसर पर केन्द्रीय कानून एवं न्याय राज्यमंत्री एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति अर्जुनराम मेघवाल ने अपने सम्बोधन में बताया कि विकसित भारत के अनेक पैरामीटर हो सकते हैं, उनमें एक पैरामीटर आध्यात्मिक पॉवर का भी है और यह पॉवर आचार्यश्री जैसे महापुरुषों से ही प्राप्त हो सकती है। भारत की आध्यात्मिक ज्ञान संपदा सबसे बड़ी पूंजी है। भारत इस पूंजी के आधार पर संसार का नेतृत्व कर सकता है। इस अवसर पर समणी सत्यप्रज्ञा द्वारा लिखित पुस्तक ‘अहिंसा विमर्श’ भी आचार्यश्री महाश्रमण के समक्ष लोकार्पित की गई। समणी सत्यप्रज्ञा ने इस संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति भी दी। आचार्यश्री ने दोनों पुस्तकों के लिए मंगल-प्रेरणा प्रदान की। इस अवसर पर अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के पावन पाथेय के साथ ही युवाचार्यश्री महावीरकुमार ने भी अपना उद्बोधन प्रदान किया। इससे पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं कुलाधिपति अर्जुनराम मेघवाल के विश्वविद्यालय परिसर में पहुंचने पर कुुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने उनका स्वागत किया।




